नियम अपने, रेवड़ी अपनों को: अफसरों के संरक्षण में ठेकों का खेल

सरस वाजपेयी

कानपुर। नगर निगम में ठेकेदारों का सिंडीकेट चलाने और टेंडरों में घालमेल के खिलाफ कार्रवाई शुरू होने के बाद अब उन अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आने लगी है, जिन पर पद पर रहते हुए चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के आरोप हैं। जांच में सामने आए मामलों ने नगर निगम में ठेकों के आवंटन की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कुछ अधिकारी अपनी तैनाती के साथ ही पसंद के ठेकेदारों को कानपुर बुला लेते थे। इसके बाद चहेते ठेकेदार को काम दिलाने के लिए नियमों में ऐसे प्रावधान किए जाते थे, जिनका सीधा फायदा उसी फर्म को मिलता था। इसके बदले अधिकारियों को सुविधा शुल्क मिलने की भी शिकायतें जांच में सामने आने की बात कही जा रही है।

चहेते ठेकेदारों को कानपुर बुलाकर अफसर बदल देते हैं नियम

बताया गया है कि नगर निगम में तैनाती पाने वाले कुछ इंजीनियरों और अधिकारियों ने अपने पुराने संपर्क वाले ठेकेदारों को शहर में काम दिलाने के लिए बाकायदा व्यवस्था तैयार की। नियम और शर्तें इस तरह तैयार की गईं कि प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाए और पसंदीदा फर्म काम हासिल कर सके। खास बात यह है कि कुछ मामलों में ऐसे बदलाव उच्चाधिकारियों की अनुमति के बिना किए जाने के आरोप हैं। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद ठेकेदारी व्यवस्था में चल रहे सिंडीकेट पर कार्रवाई शुरू हुई तो पुराने टेंडरों और उनमें लगाई गई शर्तों की पड़ताल में ऐसे मामले सामने आने लगे हैं।

इंजीनियर ने चहेते को दिये व्हाइट टैपिंग का 20 करोड़ का काम, नियम ही बदल डाले

नगर निगम के एक इंजीनियर से जुड़ा ऐसा ही मामला जांच में सामने आया है। आरोप है कि अधिकारी ने अपनी पसंद के एक ठेकेदार को कानपुर बुलाकर सड़कों पर व्हाइट टैपिंग का करीब 20 करोड़ रुपये का काम दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। सामान्य तौर पर सीसी सड़क निर्माण का काम जिस ठेकेदार को दिया जाता है, सड़क पर व्हाइट टैपिंग डालने का काम भी उसी ठेकेदार से कराया जाता रहा है। लेकिन इस मामले में अलग से टेंडर निकालकर काम देने की व्यवस्था की गई।

आरोप है कि चहेते ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए अधिकारी के स्तर से टेंडर की शर्त में यह प्रावधान कर दिया गया कि वही फर्म काम कर सकेगी, जिसने पहले व्हाइट लाइन का काम किया हो। इससे प्रतिस्पर्धा का दायरा बेहद सीमित हो गया और संबंधित ठेकेदार को फायदा पहुंचने का रास्ता साफ हो गया। सबसे गंभीर बात यह बताई जा रही है कि इस तरह की शर्त लागू करने के लिए किसी उच्चाधिकारी से अनुमति नहीं ली गई। अब इस पूरे टेंडर की प्रक्रिया, शर्त तैयार करने वाले अधिकारी और लाभ पाने वाली फर्म की भूमिका की जांच की तैयारी है।

पहले छोटे काम, फिर बढ़ाई गई काम की सीमा

नगर निगम में ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के तरीके केवल बड़े टेंडरों तक सीमित नहीं रहे। जांच में यह भी सामने आया है कि पहले छोटे-छोटे काम अलग-अलग ठेकेदारों को दिए जाते थे। बाद में करीब 10 लाख रुपये तक के काम की सीमा तय कर दी गई। इसके बाद कई छोटे कामों से जुड़ी फाइलों को एक साथ जोड़कर एक ही फाइल में शामिल करने की व्यवस्था शुरू कर दी गई।

आरोप है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल कामों को मनचाही फर्मों तक पहुंचाने के लिए किया गया। अलग-अलग कामों की प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता के बजाय उन्हें एक साथ शामिल करने से टेंडर की प्रकृति बदल गई और कुछ चुनिंदा फर्मों को फायदा पहुंचने की स्थिति बनी। अब ऐसे सभी कार्यों की फाइलें खंगालने की तैयारी है, जिनमें कामों को जोड़कर एक टेंडर या एक फाइल में शामिल किया गया।

तैनाती के साथ ही पहुंच जाते हैं ‘अपने’ ठेकेदार

नगर निगम में लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों और ठेकेदारों के बीच चर्चा है कि कुछ अधिकारी जहां भी तैनाती पाते थे, वहां उनके संपर्क वाले ठेकेदार भी सक्रिय हो जाते थे। अधिकारी के आने के कुछ समय बाद ही उनकी पसंद की फर्मों को नगर निगम के काम मिलने लगते थे। इसके लिए टेंडर की शर्तों से लेकर काम की प्रकृति और भुगतान की प्रक्रिया तक में मनमाने बदलाव किए जाने के आरोप हैं।

जांच में इस बात पर भी नजर है कि कौन अधिकारी किस अवधि में किस पद पर तैनात रहा और उस दौरान किन नई फर्मों को बड़े काम मिले। अधिकारियों की तैनाती और संबंधित ठेकेदारों को मिले ठेकों का मिलान कराया जा सकता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किसी अधिकारी के आने के बाद उसके करीबी ठेकेदार को असामान्य रूप से कितने और कितनी राशि के काम मिले।

सिंडीकेट पर कार्रवाई के बाद अफसर भी रडार पर

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद नगर निगम की ठेकेदारी व्यवस्था में सक्रिय सिंडीकेट पर शिकंजा कसने के साथ ही अब उन अधिकारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है, जिनके संरक्षण में ठेकेदारों के सक्रिय होने की शिकायतें रही हैं। अभी तक कार्रवाई का केंद्र ठेकेदार और उनकी फर्में रही हैं, लेकिन जांच में यदि यह साबित हुआ कि नियमों में बदलाव या टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने में किसी अधिकारी की भूमिका रही तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की संभावना है।

नगर निगम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक ठेकों की शर्तें बनाने से लेकर टेंडर स्वीकृत करने तक की प्रक्रिया की जांच में अब अधिकारियों की भूमिका को भी अलग-अलग स्तर पर देखा जा रहा है। खासतौर पर ऐसे मामलों को चिह्नित किया जा रहा है, जहां नियमों में बदलाव से किसी एक या कुछ फर्मों को सीधा फायदा मिला। जांच आगे बढ़ने के साथ ऐसे और मामले सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

अब खंगाली जाएंगी फाइलें, किसे कितना मिला फायदा

सिंडीकेट के खिलाफ कार्रवाई के बाद अब नगर निगम में पिछले कुछ वर्षों में हुए बड़े ठेकों की फाइलों को जांच के दायरे में लाने की तैयारी है। इसमें टेंडर की शर्तें, तकनीकी योग्यता, पात्र फर्मों की संख्या, काम मिलने वाली फर्म का पिछला रिकॉर्ड, अधिकारियों की संस्तुति और टेंडर स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया देखी जा सकती है।

 जानकारों का कहना है कि किसी अधिकारी ने अपने स्तर से ऐसी शर्त लागू कराई, जिसके कारण किसी खास फर्म को लाभ मिला, तो उसकी जवाबदेही भी तय हो सकती है। नगर निगम की ठेकेदारी व्यवस्था में चल रहे इस खेल की जांच का दायरा अब ठेकेदारों से आगे बढ़कर उन अधिकारियों तक पहुंचने लगा है, जिन पर नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ने और चहेतों को करोड़ों रुपये के काम दिलाने के आरोप हैं।

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