नेपाल में दूसरे दिन भी नहीं थमी तबाही,तिब्बत में फंसे कैलाश यात्री

निशंक न्यूज डेस्क

कानपुर। नेपाल में बुधवार को आई जल प्रलय के दूसरे दिन गुरुवार को तबाही का असली मंजर सामने आने लगा। हिमालयी क्षेत्र में आई अचानक बाढ़ और मलबे के सैलाब ने पूरे इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। नेपाल में अब तक 270 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 826 लोग अभी भी संपर्क से बाहर हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई पूरी आपदा में मृतकों की संख्या 350 से ऊपर पहुंच गई है और 1300 से अधिक लोगों के लापता होने की खबर है। राहत और बचाव दल मलबे में जिंदगी तलाश रहे हैं, लेकिन ध्वस्त सड़कें, पुल और संचार व्यवस्था अभियान में सबसे बड़ी बाधा बन गई हैं।

सबसे ज्यादा तबाही चितवन, नवलपरासी पूर्व, धादिंग, गोरखा, रसुवा, नवलपरासी पश्चिम, नुवाकोट और तनहूं जिलों में हुई है। नेपाल पुलिस के मुताबिक चितवन में 108, नवलपरासी पूर्व में 62, धादिंग में 27, गोरखा में 20, रसुवा में 17, नवलपरासी पश्चिम में 15, नुवाकोट में 12 और तनहूं में नौ शव बरामद किए जा चुके हैं। बचाव दलों ने 800 से अधिक लोगों को प्रभावित इलाकों से निकालकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया है।

मलबे के नीचे जिंदगी की तलाश

बाढ़ के पानी के साथ पहाड़ों से आया भारी मलबा गांवों, सड़कों और पुलों को बहा ले गया। कई बस्तियों का संपर्क पूरी तरह टूट गया है। बिजली, पानी और दूरसंचार सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचना मुश्किल होने के कारण हेलीकॉप्टरों को राहत और बचाव अभियान में लगाया गया है। नेपाल सेना और सुरक्षा बलों की टीमें लगातार तलाशी अभियान चला रही हैं।

बुधवार की घटना के बाद से सबसे बड़ी चिंता लापता लोगों को लेकर है। नेपाल और तिब्बत में अलग-अलग स्थानों पर बड़ी संख्या में लोग संपर्क से बाहर हैं। इनमें स्थानीय लोग, सुरक्षा बलों के जवान, जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले कर्मचारी और बड़ी संख्या में पर्यटक व तीर्थयात्री शामिल हैं। नेपाल में अकेले 644 पर्यटकों के संपर्क से बाहर होने की जानकारी सामने आई है, जिनमें 517 विदेशी नागरिक हैं।

288 भारतीयों का पता नहीं, 21 सुरक्षित

नेपाल की त्रासदी ने भारत की चिंता भी बढ़ा दी है। विदेश मंत्रालय के अनुसार नेपाल में 288 भारतीय नागरिकों से अभी संपर्क नहीं हो सका है। इनमें त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना में काम करने वाले 73 भारतीय और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए कई समूह शामिल हैं। तमिलनाडु के 21 भारतीयों को बचा लिया गया है। इसके अलावा करीब 200 भारतीय तिब्बत की तरफ फंसे हुए हैं और उन्होंने भारत से मदद मांगी है।

विदेश मंत्रालय ने नेपाल की मदद के लिए विशेष नियंत्रण कक्ष बनाया है। भारत ने राहत सामग्री लेकर दो विमान काठमांडू भेजे हैं। भारतीय अधिकारी नेपाल और चीन के अधिकारियों के संपर्क में हैं, ताकि लापता भारतीयों का पता लगाकर उन्हें सुरक्षित निकाला जा सके।

कैसे आई इतनी भयावह बाढ़

प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक नेपाल-चीन सीमा के हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर या बर्फ-पत्थर के बड़े हिस्से के टूटने से नदी का प्रवाह अचानक बाधित हुआ और फिर भारी मात्रा में पानी व मलबा नीचे की ओर आया। इसने भोटेकोशी और उससे जुड़ी नदियों में अचानक जलस्तर बढ़ा दिया। बाढ़ का पानी कुछ ही समय में इतनी तेजी से नीचे आया कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।

आगे भी खतरा बरकरार

बचाव अभियान के बीच खतरा अभी टला नहीं है। लगातार बारिश, पहाड़ों में अस्थिरता और नदियों में बढ़ते जलस्तर के कारण नए भूस्खलन और अचानक बाढ़ की आशंका बनी हुई है। चीन की ओर भी संभावित बांध जैसी झील के दबाव को लेकर सतर्कता बढ़ाई गई है। ऐसे में प्रभावित नदी घाटियों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।

नेपाल सरकार ने प्रभावित रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों के लिए तत्काल राहत के तौर पर 25 करोड़ नेपाली रुपये जारी किए हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भी आपात राहत अभियान शुरू कर दिया है।

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