निशंक न्यूज ब्यूरो।
लखनऊ की कोचिंग में हुए भीषण अग्निकांड में 15 छात्रो की मौत के बाद शासन ने कड़ा रूख अपनाया है। हादसे की जांच के लिए गठित एसआईटी ने आज मंगलवार को मौके पर जाकर जांच की शुरूआती जांच में सामने आया है कि इस जानलेवा अग्निकांड का प्रमुख कारण बिजली का अोवरलोड रहा। जिससे शार्टसर्किट हुआ और कोचिंग सेण्टर आग में घिर गया और यहां पढ़ रहे 15 छात्र छात्राअों की मौत हो गयी। एसआईटी टीम को निर्देश दिए गए है कि वह हर बिन्दु पर जांच करे। किस विभाग की क्या लापरवाही रही। एसआईटी इसका भी पता लगा रही है। सोमवार को लखनऊ में एक कोचिंग सेण्टर में आग लगने से यहां पढ रहे 15 छात्र छात्राअो की मौत हो गयी थी तथा कई छात्र छात्राए घायल हो गये थे। जिन्हे उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना की सूचना मिलते ही अपना अलीगढ़ का दौरा बीच में छोड़कर सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ में घटना स्थल देखने के बाद घायलो के उपचार की व्यवस्था देखने के लिए अस्पताल में पहुंचे थे। उन्होंने हादसे में मृत छात्र छात्राअो के परिजनो को पांच लाख रूपये मुआवजा देने तथा घायलो के उपचार के लिए 50 हजार की मदद देने की घोषणा की। अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिए गए है कि वह घायलो का बेहतर से बेहतर उपचार करे।

20 किलोवाट का कनेक्शन खर्च हो रही थी 34 किलोवाट बिजली
कोचिंग में आग लगने की घटना में 15 लोगो की मौत के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा इस घटना को गम्भीरता से लेने के बाद अधिकारी सर्तक है। इस मामले की बारीकी से जांच करने के लिए गठित एसआईटी के अधिकारी आईएस अमृत अभिजात्य तथा आईपीएस प्रवीण कुमार बुधवार की सुबह ही घटना स्थल पर पहुंचे और बारीकी से जांच शुरू की। जानकार सूत्रो की मानी जाये तो शुरूआती जांच में सामने आया कि कोचिंग के लिए 20 किलोवाट का बिजली का कनेक्शन लिया गया था। लेकिन बिजली विभाग के कर्मचारियों की सांठ गांठ से यहां जमकर बिजली की अोवरलोड़िग की जा रही थी। प्रारम्भिक जांच में यहां करीब 34 किलोवाट बिजली के उपभोग की बात सामने आयी है। जिससे यह संकेत मिलते है कि बिजली की अोवरलोडिंग इस हादसे का प्रमुख कारण रही। इससे इस बात के भी संकेत मिलते है कि इस अग्निकांड की जांच में बिजली विभाग के अधिकारी भी झुलस सकते है।
कई जिम्मेदार अधिकारी निलंबित
अग्निकांड के शुूरूआती जांच में सामने आया है कि जिस स्थान पर कोचिंग का संचालन किया जा रहा था वहां एलडीए के मानको की अनदेखी की गयी थी। जिससे यह संकेत मिलते है कि मकान मालिक व कोचिंग संचालको ने एलडीए अधिकारियों की मिली भगत से मनमाना निर्माण करा रखा था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा बार बार अतिक्रमण व नियम विरूद्र निर्माण के खिलाफ काररवाई करने के बाद भी एलडीए के अधिकारी मनमानी कर रहे थे। अग्निकांड के बाद यह बात सामने आने पर सोमवार को एलडीए के 4 अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। जिन अधिकारियों को लापरवाही के आरोप में निलंबित किया गया वह निम्न हैं मुख्यमंत्री के निर्देश पर चार लोगों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड किया गया।
1) गौरव कुमार, एक्सेन कलेक्शन (बिजली विभाग) जानकीपुरम
2) कमलेन्द्र कुमार सिंह, FSSO (फायर विभाग) इंदिरा नगर
3) अनिल कुमार, AE (LDA)
4) प्रमोद पांडे, JE (LDA)
रक्षामंत्री ने जाना हाल फूटकर रोये डिप्टी सीएम
लखनऊ में हुए भीषण अग्निकांड में 15 लोगो की मौत की सूचना मिलते ही क्षेत्रीय सांसद व केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी लखनऊ पहुंच गये। उन्होंने मृत्र छात्रो के परिजनो से मुलाकात करने के साथ ही घायलो के परिजनो से भी मुलाकात की और घायलो का बेहतर उपचार कराने के निर्देश स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को दिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक से अपनी निगरानी में घायलो का उपचार कराने को कहा। इधर सोमवार को घटना स्थल पर पहुंचे डिप्टी सीएम बृजेश पाठक मौके पर ही फूट फूट कर रोने लगे। उनका भावुक रूप देख मौके पर मौजूद कई अन्य लोगो की आंखे भी नम हो गयी। डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने मंगलवार को घाट पर जाकर हादसे में मृत छात्रों को अंतिम श्रद्धांजलि दी इस दौरान भी वह कई बार अपने आंसू नहीं रोक सके।
2016 में निरस्त किया गया था बिल्डिंग के खिलाफ ध्वस्तीकरण का आदेश
लखनऊ, 22 जून। लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड के बाद अब भवन से जुड़े पुराने दस्तावेज और प्राधिकरण की कार्रवाई गंभीर सवालों के घेरे में हैं। सोमवार को जिस भवन में आग लगने की यह दुःखद घटना हुई, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण को लेकर ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया था, लेकिन दो माह से कम समय में ही उस आदेश को निरस्त भी कर दिया गया।
1980 में हुआ था आवंटन
अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी मूल रूप से 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के तहत विजय कुमार पुत्र रामेश्वर सहाय को किराया-क्रय पद्धति पर आवंटित किया गया था। 4 नवंबर 1980 को अनुबंध निष्पादित होने के बाद भवन का कब्जा आवंटी को सौंप दिया गया। 2005 में यह भवन विक्रय विलेख के जरिए विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुआ। वहीं 19 जनवरी 2013 को इन लोगों ने यह भवन वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला के नाम बेच दिया। 7 अगस्त 2014 को लखनऊ विकास प्राधिकरण ने वीरेन्द्र व सुरेन्द्र के पक्ष में नामांतरण की प्रक्रिया पूरी की। करीब 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाले इस भवन का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को स्वतः मानचित्र योजना के तहत आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था।
ध्वस्तीकरण आदेश निरस्त होने पर उठे सवाल
हालांकि, बाद में भवन में अनधिकृत निर्माण की बात सामने आई। इसके बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज कराया। जांच के बाद विहित प्राधिकारी ने 10 मई 2016 को अनधिकृत निर्माण के विरुद्ध ध्वस्तीकरण आदेश पारित कर दिया। लेकिन, ध्वस्तीकरण आदेश जारी होने के दो माह के अंदर ही 5 जुलाई 2016 को इस आदेश को निरस्त भी कर दिया गया।
