पंडित पवन तिवारी

हल छठ के दिन 3 शुभ योग बन रहे हैं सबसे पहले ध्रुव योग प्रात:काल से लेकर रात 09 बजकर 12 मिनट तक रहेगा, उसके बाद से व्याघात योग बनेगा और पूरी रात तक रहेगा वहीं रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग मध्य रात्रि तक रहेगा हल छठ पर भरणी नक्षत्र है। हल षष्ठी, जिसे ललही छठ, तिन्नी छठ, या हरछठ भी कहा जाता है, भारतीय लोक मानस और सनातन परंपरा का वह अद्भुत संगम है जहाँ वात्सल्य (संतान प्रेम) और प्रकृति का सम्मान एक साथ दिखाई देता है।
पूजन के लिये यह हैं शुभ योग
षष्ठी तिथि का प्रारंभ 2 सितम्बर 2026, सुबह 06:12 बजे से
षष्ठी तिथि का समापन 3 सितम्बर 2026, सुबह 04:25 बजे तक
पूजा का सर्वोत्तम समय 2 सितम्बर को सुबह सूर्योदय के पश्चात से दोपहर के बीच का समय पूजन के लिए सबसे श्रेष्ठ रहेगा।
षष्ठी तिथि का प्रारंभ और मुख्य पूजन बुधवार को है। बुधवार के स्वामी ‘बुध’ हैं, जो बुद्धि और वाणी के कारक हैं। भगवान बलराम (शेषनाग के अवतार) का दिन होने के कारण यह संयोग संतान की बौद्धिक क्षमता और उनके स्वास्थ्य के लिए अत्यंत शुभ है। नक्षत्र गणना इस दिन चंद्रमा अपनी उच्च राशि या मित्र राशि में संचरण करेंगे, जो व्रती महिलाओं के मन में दृढ़ संकल्प और भक्ति की वृद्धि करेगा।
भगवान बलराम जन्मोत्सव

द्वापर युग में, अधर्म के विनाश के लिए जब भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में अवतार लिया, तो उनसे पूर्व शेषनाग ने बलराम (बलदाऊ) के रूप में जन्म लिया। उनका मुख्य आयुध (हथियार) ‘हल’ और ‘मूसल’ है। वे कृषि के देवता माने जाते हैं। इसलिए इस दिन हल की पूजा होती है और हल से जुता हुआ अन्न नहीं खाया जाता।
संतान की दीर्घायु का लिया जाता है संकल्प, व्रती महिला के लिये गाय के दूध का प्रयोग वर्जित
जेयोतिषाचार्ये प्रीति पवन तिवारी का कहना है कि संतान की दीर्घायु का संकल्प यह व्रत माताएं अपनी संतान की सुरक्षा के लिए रखती हैं। इस दिन व्रत रखने से संतान पर आने वाले घोर कष्ट टल जाते हैं और उन्हें दीर्घायु प्राप्त होती है। हल-जुते अन्न का पूर्ण निषेध इस दिन गेहूं, चावल, अरहर की दाल या ऐसा कोई भी अनाज नहीं खाया जाता जिसे उगाने के लिए खेत में हल चलाया गया हो। पसरी चावल और महुआ भोजन में केवल तिन्नी का चावल (जो तालाब के किनारे स्वतः उगता है) और महुआ का प्रयोग किया जाता है।
गाय की वस्तुओं का त्याग इस व्रत में गाय का दूध, दही, घी या गोबर का प्रयोग वर्जित है। इसके स्थान पर केवल भैंस का दूध और उससे बनी वस्तुओं का ही उपयोग किया जाता है। निर्जला व्रत अधिकतर माताएं इस व्रत को निर्जला (बिना पानी के) रखती हैं और पूजा के बाद ही विशेष आहार ग्रहण करती हैं।
यह भी है हलछठ पूजा की विधि
सगरी (प्रतीकात्मक तालाब) निर्माण घर के आंगन या सार्वजनिक स्थान पर एक छोटा गड्ढा खोदा जाता है। इसे जल से भरकर ‘सगरी’ बनाया जाता है। इसमें जलकुंभी और फूल डाले जाते हैं। मंडप स्थापना सगरी के किनारे पलाश, झरबेरी और गूलर की टहनियां गाढ़ी जाती हैं। यह प्रकृति के प्रति हमारे जुड़ाव को दर्शाता है।
माता हरछठ का श्रृंगार मिट्टी की बनी हरछठ माता की प्रतिमा रखी जाती है। उन्हें चुनरी, सिंदूर और चूड़ियां अर्पित की जाती हैं। प्रसाद अर्पण भैंस के दूध का दही, महुआ और भुना हुआ ‘सतनजा’ (चना, जौ, बाजरा, मक्का आदि सात अनाज) सगरी में चढ़ाया जाता है। संतान को आशीर्वाद पूजा के बाद माताएं अपनी संतान की पीठ पर महुआ के रस या हल्दी से ‘छापा’ (हाथ के निशान) लगाती हैं, जो सुरक्षा कवच का प्रतीक है।
