निशंक न्यूज डेस्क
कानपुर। फीफा विश्व कप 2026 के तीसरे स्थान के मुकाबले में इंग्लैंड ने फ्रांस को 6-4 से हराकर कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। विश्व कप इतिहास के सबसे रोमांचक तीसरे स्थान के मुकाबलों में शामिल इस मैच में इंग्लैंड ने पहले हाफ में 4-0 की विशाल बढ़त बना ली थी, लेकिन दूसरे हाफ में फ्रांस ने कुछ ही मिनटों के भीतर तीन गोल दागकर मुकाबले में सनसनीखेज वापसी कर ली। इसके बाद दोनों टीमें जूझकर खेलीं इंग्लैंड व फ्रांस ने एक एक गोल किया तो इंग्लैंड की बढ़त पांच-चार हो गई। अंत में इंग्लैंड ने संयम बनाए रखा और एक और गोल करके 6-4 से जीत दर्ज की। इस मुकाबले में कुल 10 गोल हुए, जो विश्व कप के तीसरे स्थान के मैचों का नया रिकॉर्ड है।

इंग्लैंड ने तीसरे मिनट में डेक्लान राइस के गोल से खाता खोला। इसके बाद एज़री कॉन्सा और फिर बुकायो साका के दो गोलों की बदौलत पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 4-0 हो गया। ऐसा लग रहा था कि मुकाबला पूरी तरह एकतरफा रहेगा।
दूसरे हाफ में किलियन एम्बाप्पे ने फ्रांस की वापसी की शुरुआत की। ब्रैडली बारकोला और फिर एम्बाप्पे के दूसरे गोल ने कुछ ही मिनटों में स्कोर 4-3 कर दिया और इंग्लैंड पर दबाव बढ़ गया। लेकिन 87वें मिनट में साका ने पेनाल्टी पर अपना हैट्रिक गोल पूरा कर इंग्लैंड को राहत दिलाई। इंजुरी टाइम में जूड बेलिंघम ने छठा गोल दागकर जीत पक्की कर दी। फ्रांस की ओर से उस्मान डेम्बेले ने अंतिम मिनटों में चौथा गोल किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
इस जीत के साथ इंग्लैंड ने 1966 में विश्व चैंपियन बनने के बाद पहली बार विश्व कप में पोडियम (शीर्ष तीन) पर स्थान हासिल किया। पिछले 60 वर्षों में यह इंग्लैंड का विश्व कप का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

फ्रांस के खिलाफ छह गोल, विश्व कप में पहली बार
विश्व कप इतिहास में पहली बार किसी टीम ने फ्रांस के खिलाफ एक ही मैच में छह गोल दागे हैं। इससे पहले फ्रांस ने विश्व कप में कभी भी छह गोल नहीं खाए थे। इंग्लैंड की 6-4 की जीत इस लिहाज से भी ऐतिहासिक बन गई। यह स्कोरलाइन (6-4) भी विश्व कप इतिहास में पहली बार देखने को मिली।
60 साल बाद इंग्लैंड को विश्व कप पदक

- 1966 – विश्व चैंपियन (स्वर्ण पदक)
- 1990 – चौथा स्थान
- 2018 – चौथा स्थान
- 2026 – तीसरा स्थान (कांस्य पदक)
इंग्लैंड ने 1966 के बाद पहली बार विश्व कप में पदक जीता है। हालांकि टीम 1990 और 2018 में भी सेमीफाइनल तक पहुंची थी, लेकिन दोनों बार चौथे स्थान पर रही। इस बार थॉमस टुखेल के मार्गदर्शन में टीम ने तीसरे स्थान का मुकाबला जीतकर 60 वर्षों का इंतजार समाप्त कर दिया।
