वेद गुप्ता
रविवार का दिन भगवान सूर्य देव की पूजा के लिये बेहद शुभ माना जाता है। आज देश के एक प्रमुख सूर्य मंदिर की चर्चा कर रहे हैं। झालरों की नगरी में स्थिय इस सूर्य मंदिर में नवीं सदी में बनाए जाने की बात कही जाती है। यह मंदिर रासजस्थान के झालरापाटन में स्थित है जिसे कभी झालरों का नगर कहा जाता था। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण नवीं सदी में हुआ था। यह मंदिर अपनी प्राचीनता और स्थापत्य वैभव के कारण प्रसिद्ध है। कर्नल जेम्स टॉड ने इस मंदिर को चार भूजा (चतुर्भज) मंदिर माना है। वर्तमान में मंदिर के गर्भग्रह में चतुर्भज नारायण की मूर्ति प्रतिष्ठित है।
यह है मंदिर का इतिहास
11 वीं सदी पश्चात् सूर्य मंदिर शैली में निर्मित ‘शान्तिनाथ जैन मंदिर’ को देखकर पर्यटकों को सूर्य मंदिर में जैन मंदिर का भ्रम होने लगता है। किन्तु चतुर्भुज नारायण की स्थापित प्रतिमा, भारतीय स्थापत्य कला का चरम उत्कर्ष एवं मंदिर का रथ शैली का आधार, ये सब निर्विवाद रूप से सूर्य मंदिर प्रमाणित करते हैं। वरिष्ठ इतिहासकार बलवंत सिंह हाड़ा द्वारा सूर्य मंदिर में प्राप्त शोधपूर्ण शिलालेख के अनुसार संवत 872 (9 वीं सदी) में नागभट्ट द्वितीय द्वारा झालरापाटन के इस मंदिर का निर्माण कराया गया था।

खजुराहो एवं कोणार्क शैली में हुआ है मंदिर का निर्माण
झालरापाटन का विशाल सूर्य मंदिर, पद्मनाथजी मंदिर, बड़ा मंदिर, सात सहेलियों का मंदिर आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध है। यह मंदिर दसवी शताब्दी का बताया जाता है। मंदिर का निर्माण खजुराहो एवं कोणार्क शैली में हुआ है। यह शैली ईसा की दसवीं से तेरहवीं सदी के बीच विकसित हुई थी। रथ शैली में बना यह मंदिर इस धारणा को पुष्ट करता है। भगवान सूर्य सात अश्वों वाले रथ पर आसीन हैं। मंदिर की आधारशिला सात अश्व जुते हुए रथ से मेल खाती है। मंदिर के अंदर शिखर स्तंभ एवं मूर्तियों में वास्तुकला उत्कीर्णता की चरम परिणति को देखकर दर्शक आश्चर्य से चकित होने लगता है।
उच्च वास्तकला का नमूना हैं यहां की मूर्तियां
शिल्प सौन्दर्य की दृष्टि से मंदिर की बाहरी व भीतरी मूर्तियां वास्तुकला की चरम ऊँचाईयों को छूती है। मंदिर का ऊर्घ्वमुखी कलात्मक अष्टदल कमल अत्यन्त सुन्दर जीवंत और आकर्षक है। मदिर का उर्ध्वमुखी अष्टदल कमल आठ पत्थरों को संयोजित कर इस कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया है, जैसे यह मंदिर कमल का पुष्प है। मंदिर का गगन स्पर्शी सर्वोच्च शिखर 97 फीट ऊँचा है। मंदिर में अन्य उपशिखर भी हैं। शिखरों के कलश और गुम्बज अत्यन्त मनमोहक है। गुम्बदों की आकृति को देखकर मुग़लकालीन स्थापत्य एवं वास्तुकला का स्मरण हो जाता है। सम्पूर्ण मंदिर तोरण द्वार, मण्डप, निज मंदिर, गर्भ ग्रह आदि बाहरी भीतरी भागों में विभक्त हैं समय समय पर मंदिर के जीर्ण ध्वजों का पुनरोद्धार एवं ध्वजारोहण हुआ है।
चिंता का विषय बना है परिसर में बढ़ता अतिक्रमण
संवत 1632, , एवम् 1871 के ध्वज उत्सव उल्लेखनीय हैं। मण्डप की छत पर साधुओं की कलात्मक जीती जागती मूर्तियां देखते बनती है। देवस्थान विभाग से जुड़ा यह मंदिर विशेष देखभाल की अपेक्षा रखता है मंदिर के परिसर में बढ़ता अतिक्रमण और व्यावसायिक दुकानों का अस्तित्व मंदिर के पुरा एतिहासिक स्वरूप व इसकी भव्यता में बाधक हैं। झालावाड़ ज़िला विकास की बहुआयामी संभावनाओं से भरा है। यह पर्यटन के राष्ट्रीय फलक पर तेजी से उभर रहा है। भविष्य में झालरापाटन का सूर्य मंदिर राष्ट्रीय स्तर की सांस्कृतिक निधि के रूप में मान्यता प्राप्त करेगा और नगर की समृद्धि में सहायक हो सकता है।
