सरस वाजपेयी
कानपुर। नगर निगम में ठेकेदारों के सिंडीकेट के खिलाफ कार्रवाई शुरू होने के बाद अब जांच की दिशा पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं। कार्रवाई में आधे-अधूरे अभिलेख लगाकर ठेके हासिल करने के आरोप में ठेकेदारों को जेल भेजा गया और सात फर्मों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया, लेकिन जिस व्यवस्था के तहत इन फर्मों को पात्र होने की रिपोर्ट दी गई, उस व्यवस्था के जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारियों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर अभिलेख गलत थे तो उन अभिलेखों को सही बताकर रिपोर्ट देने वालों नगर निगम के अधिकारियों व कमेटी में शामिल पार्षदों पर कार्रवाई करने से अधिकारी क्यों बच रहे हैं।
नगर निगम में हाट मिक्स प्लांट से संबंधित ठेकों में गड़बड़ी की शिकायतों के बाद शुरुआती कार्रवाई ठेकेदारों पर हुई। इस मामले में संजीव जैन और रज्जन वाजपेयी को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। इसके अलावा आधे-अधूरे कागजात लगाकर ठेका हासिल करने के आरोप में सात फर्मों को ब्लैकलिस्ट किया गया है। कार्रवाई का आधार यह रहा कि टेंडर प्रक्रिया में जरूरी अभिलेख और पात्रता संबंधी शर्तों को पूरा नहीं किया गया, लेकिन इसी कार्रवाई ने नगर निगम की उस जांच व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है, जिसे ठेकेदारों की पात्रता और हाट मिक्स प्लांट की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था।
कमेटी क्यों देती रही जांच की भ्रामक रिपोर्ट

हाट मिक्स प्लांट से संबंधित काम में किसी अपात्र फर्म को ठेका न मिल सके, इसके लिए नगर निगम ने एक जांच कमेटी बनाई थी। कमेटी का काम हाट मिक्स प्लांट का निरीक्षण करना और अपनी रिपोर्ट देना था। संबंधित फर्म के पास हाट मिक्स प्लांट उपलब्ध होने की पुष्टि भी इसी रिपोर्ट के जरिए की जाती थी। इसके बाद ही टेंडर प्रक्रिया में आगे बढ़ने का रास्ता साफ होता था।
कमेटी में एई और जेई स्तर के अधिकारियों के साथ दो पार्षदों को भी शामिल किया गया था। इसमें एई/जेई स्तर के अधिकारी दिवाकर भास्कर, माणिक चंद्र और दिनेश प्रसाद के अलावा भाजपा पार्षद नीरज गुप्ता तथा अभिनव शुक्ला ‘गोलू’ के नाम शामिल बताए जाते हैं। कमेटी में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को शामिल करने का मकसद भी यही माना गया था कि निरीक्षण और रिपोर्ट की प्रक्रिया पर अतिरिक्त निगरानी रहे।
तो फिर गलत रिपोर्ट कैसे पास होती गई?

नगर निगम में सिंडीकेट तोड़ने के बाद की गई कार्रवाई को लेकर नगर निगम के जिम्मेदार लोग ही सवाल उठाने लगे हैं कि यदि कुछ ठेकेदारों ने अधूरे या गलत अभिलेख लगाकर ठेके हासिल किए थे तो निरीक्षण कमेटी की रिपोर्ट में यह बात क्यों नहीं पकड़ी गई? क्या कमेटी ने वास्तव में प्लांटों का भौतिक सत्यापन किया था? यदि किया था तो रिपोर्ट में संबंधित फर्मों को पात्र कैसे बताया गया? और यदि बिना पर्याप्त सत्यापन के रिपोर्ट तैयार हुई तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
नगर निगम की कार्रवाई में यदि गलत अभिलेख लगाने वाले ठेकेदारों को जिम्मेदार मानकर जेल भेजा जा सकता है और फर्मों को ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है, तो गलत अथवा संदिग्ध रिपोर्ट के आधार पर उन्हीं फर्मों को पात्र ठहराने वाली जांच प्रक्रिया की भी जांच क्यों नहीं हो रही?
कमेटी की भूमिका की जांच से खुलेगा पूरा खेल
सिंडीकेट के खिलाफ कार्रवाई के बाद नगर निगम में यह चर्चा तेज है कि केवल ठेकेदारों पर कार्रवाई से पूरा मामला सामने नहीं आएगा। यदि किसी फर्म ने गलत दस्तावेज लगाए और वह दस्तावेज जांच के बाद भी स्वीकार कर लिया गया, तो दस्तावेज लगाने वाले के साथ उसे सत्यापित करने वाले की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
ऐसे में कमेटी के सदस्यों की ओर से दी गई रिपोर्ट, निरीक्षण की तारीख, मौके पर किए गए सत्यापन, प्लांट की लोकेशन, मशीनरी की उपलब्धता और उससे संबंधित अभिलेखों का मिलान कराने की जरूरत है। इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि रिपोर्ट वास्तविक निरीक्षण के आधार पर दी गई थी या कागजों पर ही प्रक्रिया पूरी कर दी गई।
ठेकेदार जेल में, कमेटी में शामिल लोगों पर चुप्पी क्यों

सिंडीकेट प्रकरण में नगर निगम स्तर पर अब तक हुई कार्रवाई का सबसे कमजोर पक्ष यही दिखाई दे रहा है कि कार्रवाई का दायरा ठेकेदारों और उनकी फर्मों तक सीमित है। जबकि टेंडर प्रक्रिया में ठेकेदार अकेले ही पूरा खेल नहीं कर सकता। पात्रता की जांच, दस्तावेजों का परीक्षण, तकनीकी रिपोर्ट और स्वीकृति जैसी कई सरकारी प्रक्रियाओं के बाद ही किसी फर्म को काम मिलता है।
ऐसे में जांच एजेंसियों और नगर निगम प्रशासन के सामने अब असली सवाल यही है कि क्या सिर्फ ठेकेदारों की भूमिका की जांच होगी या उन अधिकारियों-कर्मचारियों की भी जिम्मेदारी तय होगी, जिनकी रिपोर्ट और सत्यापन के बाद ठेके दिए गए। लोगों के बीच चर्चा यह है कि अगर ठेकेदारों ने गलत दस्तावेज लगाए तो उन्हें जेल भेजा गया। अब अगर उन्हीं दस्तावेजों को सही बताने वाली रिपोर्ट गलत पाई जाती है तो रिपोर्ट देने वालों पर कार्रवाई होगी या अपने लोगों के कमेटी में शामिल होने के कारण इन्हें बचाने का खेल किया जाएगा।
