वेद गुप्ता
श्री कृष्ण का जन्म, जिसे जन्माष्टमी के नाम से जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है। श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं और उनके जन्म की कहानी अद्भुत और प्रेरणादायक है। कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा नगरी में अत्याचारी राजा कंस का शासन था। कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था। विवाह के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा। इस भविष्यवाणी से भयभीत होकर कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया और उनकी संतान को जन्म लेते ही मारने का आदेश दिया।
कंस ने देवकी की सात संतानों को मार डाला। लेकिन जब देवकी के गर्भ से आठवीं संतान का जन्म हुआ, तब भगवान विष्णु ने स्वयं वसुदेव और देवकी के सामने प्रकट होकर उन्हें अपना दिव्य रूप दिखाया। उन्होंने वसुदेव से कहा कि वे इस बच्चे को गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के घर ले जाएं और बदले में यशोदा की नवजात बेटी को लाकर कंस को सौंप दें। भगवान विष्णु की माया से कारागार के सभी पहरेदार सो गए, और वसुदेव ने नवजात श्रीकृष्ण को टोकरी में रखा और यमुना नदी पार करके गोकुल पहुंच गए। उन्होंने बालकृष्ण को नंद बाबा और यशोदा के पास छोड़ दिया और यशोदा की बेटी को लेकर मथुरा लौट आए।

जब कंस को उस बच्ची के बारे में पता चला, तो उसने उसे मारने का प्रयास किया, लेकिन वह देवी योगमाया के रूप में प्रकट हुईं और कंस को बताया कि उसे मारने वाला बच्चा पहले ही गोकुल में सुरक्षित है। यह सुनकर कंस क्रोधित हो गया और श्रीकृष्ण को मारने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन सभी प्रयास असफल रहे।
श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में ही कई राक्षसों का वध किया और अंततः कंस का वध करके मथुरा को उसके अत्याचार से मुक्त किया।
धर्म की स्थापना के लिये हुआ था भगवान श्री कृष्ण का जन्म
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए हुआ था। उनके जन्मदिन को जन्माष्टमी के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें व्रत, पूजा, भजन और विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं।
