वेद गुप्ता
कहा जाता है कि अरावली में पर्वतों ने प्रकाश के पथ में बाधाएं खड़ी की, वहां मंदिर के रूप में उजाला हुआ लेकिन यह भी भाव रहा कि सूर्यदेव कहीं जाए ही नहीं, उनके आस्था के आलय में विराजमान रहें। यह बड़ा सच है कि शासकों और शिल्पियों ने सूर्य सप्तमी पर रवि रश्मियों के पथ को साधकर स्थापत्य से उसको सत्यापित किया! यह कोई नहीं बताता कि इसके पीछे कारण क्या था
मेवाड़ के सबसे ऊंचे जरगा पहाड़ के पश्चिम में भगवान पद्मनाभ ( विष्णु) का जो मंदिर है, उसमें सूर्य की दो प्रतिमाएं बहुत अलग रूप में रही है : सात अश्व और एक चक्र वाले रथ पर विराजित अपने मंडल सहित भगवान भुवन भास्कर। इतनी सुंदर और सुघड़ कि देखते ही मोहित करें।
कई लोगों को नहीं पता है कि मेवाड़ – मालवा में वर्धनों और औलिकरों ने सूर्यायतनों की स्थापना अपने पराक्रम चक्र की निरंतरता के लिए आरंभ की। उन्होंने सूर्य के अनुग्रह से राज्य का तेज पाया और स्वयं वैसी ही उपाधि धारण की विष्णु और शैव सहित शक्ति पूजकों ने उसी परम्परा में शासकों की उपाधियां और विरूद को सम्मानित रखा लेकिन अपने देवानुग्रह को अग्रणी रखा!
इस कार्य को बाद में प्रतिहाराें ने आगे बढ़ाया। उस काल की मूर्तियों में प्रहरण या आयुधधारी प्रमुखता से अंकित हुए। तभी अनेक राज प्रमुखों, जिनमें भारतीय संस्कृति में विलीन हो रहे कुछ वंशों ने पृथ्वी उद्धारक भगवान वराह की तरह अपने गुणों को सिद्ध करते हुए आदिवराह की मूर्तियों की प्रतिष्ठा की। वराह के देह में हर लोक है, वैसे ही हर विषय ( राज्य, जनपद) उनके पास है और शेष अधीनस्थ हों, इस हेतु यह महा उपाय भी था। मिहिरकुल का ऐरन अभिलेख क्या बताता है!
पलासमा का विष्णु मंदिर उस स्मृति का साक्ष्य है कि नारायण के विष्णु होने के लिए सूर्य का साथ हों, जैसा कि वराहमिहिर (अपने टिकनिक यात्रा ग्रंथ के मंगलाचरण में) पद्मधन हरि और सूर्य को एक साथ रखते हैं। पलासमा में दो सूर्य हैं। पलासमा गांव नांदेसमा के बाद आता है। इसके बाद, रणकपुर, आगे बढ़वान ( ब्राह्मणवाड़), भीनमाल और मोढ़ेरा सबके सब उत्तरायण वाले सूर्य के 0 से 180° कोणों के प्रतीक! यह आश्चर्यजनक है कि कर्क रेखा के आसपास एकाधिक कोणों पर सूर्य मंदिर की सुंदर धारणा अक्षांश गणना का संरक्षण रहा है!
