निशंक न्यूज
संतान के सुख सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य के लिये माता से समर्पण का प्रमुख पर्व सकठ चौथ मंगलवार को मनाया जाएगा। उत्तर भारत की लोक परंपराओं में सकट चौथ एक ऐसा पर्व है जो स्त्री अनुभव, मातृत्व और संतान सुरक्षा की सामूहिक स्मृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह व्रत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण और कस्बाई समाज में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। सकट चौथ को कई स्थानों पर संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। यह माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ता है और भगवान गणेश की उपासना के साथ जुड़ा हुआ है।
संतान की सुरक्षा स्वास्थ्य और दीर्घायु होना है सकट चौथ का मूल भाव

सकट चौथ का मूल भाव संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घायु है। लोक मान्यता है कि यह व्रत माताओं द्वारा अपने बच्चों को हर प्रकार के संकट से बचाने के संकल्प के रूप में किया जाता है। उत्तर भारत के समाज में जहां ऐतिहासिक रूप से स्वास्थ्य सेवाएं सीमित रहीं, वहां ऐसे व्रत स्त्री चिंता, देखभाल और सामूहिक विश्वास के सांस्कृतिक रूप बन गए। यह पर्व केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है बल्कि मातृत्व से जुड़ी उस सामूहिक अनुभूति को दर्शाता है जिसमें मां अपने संपूर्ण त्याग और अनुशासन के माध्यम से संतान के भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास करती है।
माता पार्वती ने भगवान गणेश की रक्षा के लिये रखा था यह व्रत
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने पुत्र भगवान गणेश की रक्षा और दीर्घायु के लिए यह व्रत किया था। गणेश को संकट हरने वाला देव माना जाता है और इसी कारण इस दिन उनकी विशेष पूजा होती है। लोककथा में एक गरीब महिला का उल्लेख मिलता है जिसका पुत्र बार बार बीमार रहता था। गांव की एक वृद्धा ने उसे सकट चौथ का व्रत करने की सलाह दी। महिला ने निर्जला व्रत रखा, चंद्र दर्शन के बाद गणेश जी की पूजा की और उसी वर्ष उसके पुत्र का स्वास्थ्य सुधर गया। तभी से यह व्रत संतान संकट निवारण का प्रतीक माना जाने लगा। ग्रामीण समाज में यह कथा आज भी समूह में बैठकर गाई या सुनाई जाती है जिससे यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहती है।
इस पूजा विधि और व्रत की प्रक्रिया

सकट चौथ का व्रत प्रायः निर्जला रखा जाता है।
प्रातः काल स्नान के बाद महिलाएं संकल्प लेती हैं कि वे अपने पुत्र या संतान के कल्याण के लिए यह व्रत करेंगी। दिनभर बिना अन्न जल ग्रहण किए संयम रखा जाता है।
सायंकाल पूजा स्थल पर चौकी बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। पूजा में तिल, गुड़, मूंगफली, गन्ना, लड्डू और दूर्वा का विशेष महत्व होता है। दीप प्रज्वलन और सकट चौथ की कथा के साथ पूजा संपन्न की जाती है।
रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद चंद्रमा को जल या दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात गणेश जी को भोग अर्पित कर व्रत खोला जाता है।
वर्ष 2026 में सकट चौथ की तिथि
वर्ष 2026 में सकट चौथ 6 जनवरी मंगलवार को मनाई जाएगी।
यह माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि है।
व्रत का पारण चंद्र दर्शन के बाद किया जाएगा।
चंद्रमा के निकलने का समय स्थान के अनुसार अलग अलग हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग या मंदिर सूचना के अनुसार समय देखना उपयुक्त माना जाता है।
सकट चौथ पर ग्रामीण समाज में होता है सामूहिक स्त्री आयोजन
उत्तर भारत के गांवों में सकट चौथ केवल व्यक्तिगत व्रत नहीं बल्कि सामूहिक स्त्री आयोजन भी है। महिलाएं एक साथ बैठकर कथा सुनती हैं, तिल गुड़ के प्रसाद का आदान प्रदान करती हैं और अपने अनुभव साझा करती हैं। कई स्थानों पर यह व्रत मायके में करने की परंपरा भी प्रचलित है। यह पर्व ग्रामीण स्त्री जीवन में आपसी सहारा, साझा विश्वास और सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करता है।
मातृत्व की चिंता, धैर्य और आस्था का पर्व भी है सकट
सकट चौथ उत्तर भारत की लोक संस्कृति में मातृत्व की चिंता, धैर्य और आस्था का पर्व है। यह दिखाता है कि धार्मिक परंपराएं कैसे सामाजिक जरूरतों और मानवीय भावनाओं से आकार लेती हैं। बदलते समय में भी सकट चौथ की प्रासंगिकता बनी हुई है क्योंकि यह पर्व मां और संतान के बीच उस अदृश्य लेकिन मजबूत रिश्ते का प्रतीक है जो हर समाज की नींव होता है।
