निशंक न्यूज, कानपुर।
कानपुर नेत्र चिकित्सक सोसाइटी (कॉस) द्वारा 16 वां वार्षिक नेत्र विज्ञान सम्मेलन इस वर्ष भव्य रूप से संपन्न के पहले दिन इस सम्मेलन में देश-विदेश के ख्यातिप्राप्त नेत्र विशेषज्ञ और नेत्र विज्ञान के क्षेत्र के अग्रणी दिग्गज ने शिरकत किया । आप्थाल्मिक कानपुर सोसाइटी अपनी 16 वीं वार्षिक कॉन्फ्रेंस का आयोजन स्वरूप नगर स्थित एक निजी होटल में किया गया। दो दिवसीय अधिवेशन की अध्यक्षता डॉ मनीष महिंद्रा व सचिव डॉ मोहित खत्री ने की। इस सम्मेलन में कानपुर नगर एवं देश विदेश से लगभग 200 नेत्र शल्य चिकित्सक भाग लिया। जो अपना अनुभव दो दिवसीय कार्यक्रम में साझा करेंगे ।
किसी भी मौसम में कराया जा सकता है मोतियाबिंद का आपरेशन

नवी मुम्बई से आए डॉ सुहास ने बताया कि 1988 के आंकड़ों के मुताबिक 80 फीसदी अंधता मोतियाबिंद से होती है,लेकिन नई अत्याधुनिक विधि और उपकरण आ जाने से अब इसकी प्रतिशत केवल 50 रह गई है वो भी मरीजों की लापवाही के चलते हो रही है। मोतियाबिंद का ऑपरेशन अब किसी भी मौसम में कराया जा सकता है। यह पूरी तरह से भ्रम है कि केवल सर्दियों में ही मोतियाबिंद का ऑप्रेशन हो सकता है ऐसा नही है। शुगर होने पर आंखो के कार्निया की जांच जरूर कराए।
आधुनिक तकनीकि से हो रहा बेहतर उपचार
इसी क्रम में डॉ दिनेश तलवार ने बताया कि अधिकांश मरीजों को ही जानकारी नही होती है कि उनको मोतियाबिंद हो गया है। जांच करने पर ही पता चलता है कि उनको आंखो में टीबी भी है। उन्होंने बताया कि अब नई विधि से चश्में का नम्बर हटाया जा रहा है। 18 वर्ष के बाद हाई नंबर पर फेकी लेंस नई विधि से ऑपरेशन किया जा रहा है।
आसानी से दूर की जा सकती है आंखों की समस्या

वहीं डॉ शरद बाजपेई ने बताया कि 18 साल के बाद यह देखना जरूरी होता है कि मरीज की कार्निया , उसकी थिकनेस कितनी हुई है। उसके बाद निर्णय लिया जाता है कि मरीज को मरीज का इलाज लेजर विधि से किया जाए या फिर आईसीएल लेंस डाला जाए। हांलकि दोनो ही 100 फीसदी सफलता पूर्वक काम करते है।
ज्यादा हो रही है ग्लूकोमा के मरीजों की संख्या

अंत में डॉ सुनीता दुबे ने बताया कि ग्लूकोमा के मरीजों की संख्या ज्यादा हो रही है। इसको शुरुआती तौर पर नहीं पहचाना जा सकता ,मगर मरीज ध्यान दे की नजदीक की नजर धीरे-धीरे कम हो रही है, पहली प्राथमिकता हो सकती है। डॉ सुनीता का कहना है पहले दवा डाल कर इलाज किया जाता था ,लेकिन अब नई तकनीकी आ जाने से इंजेक्शन और स्टंट लगा कर इसका बचाव संभव है। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रमुख राष्ट्रीय विशेषज्ञों में डॉ. सुहास , डॉ. गौरव लूथरा, डॉ. सुनीता दुबे, डॉ. डी. रामामूर्ति, डॉ. कस्तूरी भट्टाचार्य, डॉ. दिनेश तलवार, डॉ. विपिन साहनी, डॉ. जतिंदर , डॉ. जिमी मित्तल, डॉ. प्रशांत ,बावन कुले और डॉ. रूपक रॉय शामिल रहें।