वेद गुप्ता
राम-रावण युद्ध के दौरान घटी एक घटना बताती है कि भले ही रावण के पुत्र महापराक्रमी मेघनाद का वध लक्ष्मण ने किया था और जीते जी मेघनाद (इंद्रजीत) ने राम की सेना का बहुत नुकसान किया हो अपनी शक्ति से राम के अनुज लक्ष्मण को मौत के द्वार तक पहुंचा दिया हो लेकिन मेघनाद की पत्नी सुलोचना पतिव्रता थी और उसके पतिव्रता धर्म के कारण भगवान राम भी सुलोचना का बहुत सम्मान करते थे और उन्होंने सुलोचना के पहुंचने तक मेघनाद के कटे शीश को अपनी गोद में ही रखा था।
वासुकी नाग की पुत्री थी मेघनाद की पत्नी सुलोचना
सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के महापराक्रमी पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) की पत्नी थीं। एक भयंकर युद्ध में लक्ष्मण के हाथों मेघनाद का वध हुआ और उनका कटा हुआ शीश भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया। पति की मृत्यु और सुलोचना का निर्णय अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना अत्यंत दुखी हुईं। उन्होंने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर अपने पति का शीश वापस लाने की प्रार्थना की। रावण इसके लिए तैयार नहीं हुए। तब सुलोचना ने उनसे कहा कि उन्हें स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश लाना चाहिए, “क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।”
राम ने कहा था भूमि पर न गिरने पाए मेघनाद की मस्तक
इसी बीच, युद्धभूमि में श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने प्रतिज्ञा ली थी कि वह रणभूमि में रावण-पुत्र मेघनाद का वध करेंगे। प्रभु राम ने लक्ष्मण से एक बात का विशेष ध्यान रखने को कहा था कि लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है यदि मेघनाद का मस्तक भूमि पर गिरता, तो ऐसी साध्वी के पति का अंग खाते और युद्ध में विजय की आशा त्यागनी पड़ती, जिससे सेना का ह्रास हो जाता। लक्ष्मण ने मेघनाद का मस्तक तो उतारा, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को सुलोचना के पास ले आए।
मेघनाद की कटी भुजा ने दूर किया था सुलोचना का संदेह
युद्धभूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से अपने पति के शव को देखकर सुलोचना अत्यंत व्याकुल हो गईं। लक्ष्मण ने वर्षों से अपनी पत्नी और नींद को त्यागा हुआ था, और वे तेजस्वी तथा सभी देवी गुणों से संपन्न थे। तभी सुलोचना को आकाश में उड़ती हुई अपने पति की कटी हुई भुजा मिली, जिसे उन्होंने स्पर्श नहीं किया, यह सोचकर कि पर-पुरुष के स्पर्श का दोष लगेगा। इस दशा में निर्णय करने के लिए उन्होंने भुजा से कहा यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पातिव्रत्य की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे यह सुनकर भुजा ने लेखनी पकड़ी और लिख दिया: प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। कटी हुई भुजा की पंक्तियाँ पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गईं। तभी पुत्र-वधू के विलाप को सुनकर लंकापति रावण ने आकर कहा: शोक न कर पुत्री! प्रातः होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लौट जाएँगे। मैं रक्त की नदियाँ बहा दूँगा! इस पर रोती हुई सुलोचना बोलीं: “पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी? सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए’।
राम के पास सुलोचना जब राम के शिविर में पहुँची, तो सभी योद्धा अचंभित थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उनके पति का शीश भगवान राम के पास है। सुग्रीव ने उन्हें शांत करने के लिए पूछ लिया सुलोचना ने स्पष्टता से जवाब दिया: “मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गई थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया।” राम शिविर में मेघनाद का शीश देखते ही सुलोचना बहुत भावुक हो गईं और उनकी आँखों से आंसू बहने लगे। रोते-रोते उन्होंने पास खड़े लक्ष्मण को देखा और कहा, सुमित्रा-नंदन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाद का वध तुमने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी अनन्य उपासिका हैं और मैं भी मेरे पति चरणों में अनुरक्ति रखने वाली उनकी सेविका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिए युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।
सुलोचना के आने की खबर पाकर खड़े हो गए थे भगवान राम
सुलोचना का आगमन सुनकर श्रीराम खड़े हो गए और विनम्रता से सुलोचना के पास आते हुए बोले: “देवी, तुम्हारे पातिव्रत्य के विषय में कोई संदेह नहीं है। तुम धन्य हो। तुम जैसी साध्वी का सम्मान है, तभी सुग्रीव ने व्यंग्य भरे शब्दों में कहा: “निर्जान भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हँस सकता है!” श्रीराम ने कहा व्यर्थ बातें मन करो मित्र! पातिव्रता के महात्म्य को तुम नहीं जानते। यदि यह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हँस सकता है।श्रीराम की मुखाकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गईं। उन्होंने कहा, यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हँस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि मेघनाद का कटा हुआ मस्तक ज़ोरों से हँसने लगा। यह देखकर सभी दंग रह गए और सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया।
सुलोचना ने लिया था सती बनने का निर्णय
चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना कि, भगवान आज मेरे पति की अन्त्येष्टि किया और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ।” इस प्रकार, सुलोचना ने सती होने का निर्णय लिया और अपने पतिव्रत्य की शक्ति से न केवल सबको चकित किया, बल्कि अपने पति मेघनाद के साथ परलोक सिधार गईं।
