त्रियुगी नारायण मंदिर में क्या है, अखंड धुनी का रहस्य ?

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वेद गुप्ता /प्रभात त्रिपाठी
निशंक न्यूज़

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में प्राचीन त्रियुगी नारायण मंदिर है। इस मंदिर के संबंध में गांव में मान्यता प्रचलित है कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने कठोर तपस्या की थी। देवी की कठोर तपस्या से शिवजी प्रसन्न हो गए थे। इसके बाद इसी गांव में भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। यहां एक कुंड में अखंड धुनी जलती रहती है। गांव के लोग कहते हैं इसी जगह पर शिवजी और पार्वती बैठे थे और ब्रह्माजी ने विवाह करवाया था। अग्नि कुंड के चारों तरफ भगवान ने फेरे लिए थे। मंदिर में भक्त लकड़ियां चढ़ाते हैं और भगवान का प्रसाद मानकर अग्नि कुंड की राख अपने घर ले जाते हैं। ये राख घर के मंदिर में रखी जाती है। शिव-पार्वती के विवाह में ब्रह्माजी पुरोहित बने थे। विवाह से पहले ब्रह्मदेव ने मंदिर में स्थित एक कुंड में स्नािन किया था, जिसे ब्रह्मकुंड कहा जाता है। तीर्थ यात्री इस कुंड में स्नान करते हैं। यहां एक और कुंड है, जिसे विष्णु कुंड कहते हैं। शिजव-पार्वती विवाह में विष्णुजी ने पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी। कहते हैं विष्णु कुंड में स्नान करके भगवान विष्णु विवाह में शामिल हुए थे।