कानपुर, कुलदीप, करिश्मा और कीर्तिमान

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चाइनामैन ने मचाया क्रिकेट की दुनिया में तहलका

वन-डे में दूसरी बार हैट्रिक लेकर रचा बड़ा इतिहास

दिखा दिया कि कनपुरिये किसी मामले में कम नहीं

शैलेश अवस्थी

से कानपुर, से क्रिकेट, से कुलदीप, से कोशिश”, कर्म से करिश्मा और से ही कीर्तिमान। यहां हम उस कुलदीप यादव की बात कर रहे हैं, जिसने कल 18 दिसंबर को विशाखापट्टनम स्टेडियम में अंतर्राष्ट्रीय वन-डे क्रिकेट में दूसरी बार हैट्रिक लेकर इतिहास रच दिया। यह करिश्मा करने वाला वह भारत का पहला और विश्व का छठा गेंदबाज बन गया। उसके इस कीर्तिमान पर कनपुरिये फूले नहीं समा रहे हैं और यह स्वाभाविक है।

बचपन में कानपुर की गलियों में क्रिकेट खेलते हुए जिसने कुलदीप को देखा होगा और हौसलाफजाई की होगी, वे आज कितने खुश होंगे। कुलदीप के साथ कानपुर का भी नाम क्रिकेट इतिहास के स्वर्णिम पन्ने पर लिख गया। विशाखापट्टनम में यह यादगार मैच वेस्टइंडीज के खिलाफ खेला जा रहा था। यह सीरीज का दूसरा मैच था। इसके पहले का मैच इंडिया हार चुकी थी। वेस्टइंडीज के धुरंधर बल्लेबाज शाई होप मैदान में जम चुके थे। वह 78 रन पर खेल रहे थे। 32 ओवर का मैच हो चुका था। 33 वें ओवर के लिए फिर कुलदीप को बुलाया गया था। इस ओवर की चौथी गेंद पर कुलदीप ने शाई होप को विराट कोहली के हाथों कैच करवाकर भारत की होप बढ़ा दी। इसके बाद जेसन होल्डर को स्टंप करवा कर पैवेलियन भेज दिया। फिर आए अल्जारी जोसेफ को भी उन्होंने कैच आउट कर दिया और इसी हैट्रिक के साथ इतिहास रच दिया। भारतीय टीम ने वेस्टइंडीज को 107 रन से हराकर 1-1 से बराबरी कर ली। इसके पहले 2017 में कुलदीप ने कोलकाता से ईडेन गार्डन में आस्ट्रेलिया के खिलाफ हैट्रिक ली थी। कुलदीप और चहल की जोड़ी कहर ढा रही थी कि अचानक ये जुगलबंदी टूट गई। यहां यह बताना जरूरी है कि क्रिकेट जगत में कुलदीप का कोई गॉड फादर नहीं है। वे अपने बल के बदौलत जमे हैं।

इसके बाद जो मैदान में जश्न देखने लायक था। कुलदीप को साथी खिलाड़ियों ने कंधो पर उठा लिया और पूरे देश ने उन्हें सिरआंखों पर। यह वही कुलदीप हैं, जो पिछले छह महीने से अंतर्राष्ट्रीय किक्रेट से बाहर थे। या यूं कहें कि बाहर कर दिए गए थे। क्रिकेट समीक्षकों ने इस पर हैरत भी जताई थी, लेकिन धुन के पक्के कुलदीप जरा भी हताश नहीं थे। वे अपनी कलाइयों को मजबूत करते रहे। अभ्यास का वक्त और बढ़ा दिया। मेहनत दोगुनी कर दी और अपना आत्मविश्वास डिगने नहीं दिया। तीन दशक पहले की बात करें तो कानपुर के ही स्पिनर गोपाल शर्मा को भी टेस्ट किक्रेट में शामिल किया गया था। कानपुर में ही शुरुआत हुई थी, लेकिन वह लंबे समय तक इस यात्रा को जारी नहीं रख सके थे। अब कुलदीप ने जिस तरह कानपुर का नाम चमकाया है, वह लंबे समय तक याद रह जाएगा।

पिछले 10 महीने कुलदीप के लिए बड़ी और कड़ी परीक्षा के बीते। लेकिन यह भी सही है कि वह कभी खबरों से गायब नहीं हुए। कुछ मौकों पर उनकी कमी भारतीय क्रिकेट को खटकी और शायद यही कारण था कि इस प्रतिभा को ज्यादा दिन इग्नोर नहीं कर सके। जैसे ही उन्हें मौका दिया गया, उन्होंने चटाचट एक के बाद एक विकेट चटका कर न केवल अपने को साबित किया, बल्कि वेस्टइंडीज के खिलाफ भारत की जीत की इबारत भी लिख दी। कुलदीप ने अपने दसवें ओवर की अंतिम तीन गेंदों में यह कीर्तिमान बनाया। जरा सोचिये, अगर वह ये मौका चूक जाते तो क्या होता। उनके क्रिकेट कैरियर का सवाल था।

कुलदीप की मेहनत और लगन एक बार फिर उस सूत्र को प्रमाणित कर दिया, जिसमें कहा गया है कि यदि पूरे विश्वास और समर्पण से कर्म करो, तो पूरी कायनात आपके साथ खड़ी हो जाती है और आप चमत्कार कर देते हो। कर्मठता के सामने किस्मत सिर झुकाती है। कुलदीप को यह उपलब्धि एक दिन में नहीं मिल गई। तीन हैट्रिक गेंदों के लिए कुलदीप ने तीन करोड़ गेंदें डाल कर अभ्यास किया होगा। न तो जून की गर्मी की परवाह की, न ही कड़कड़ते जाड़े में अभ्यास छोड़ा और न ही मूसलाधार बारिश में छुट्टी ली। मैदान नहीं तो क्या घर के आंगन में अभ्यास करते रहे। कुछ नहीं तो जेहन में विचारते रहे कि क्या करें, जिससे दुनिया का ध्यान खींचें। गेंद को किस तरह मनाते होंगे, कलाइयों को कैसे मजबूत करते होंगे। इस महान उपल्बिध के लिए कितना अपने को कसा होगा, एकाग्रता के लिए कितना तप किया होगा। कुलदीप जैसे नौजवान हर किसी के लिए एक प्रेरणा हैं, जो देश के लिए कुछ करने और दुनिया में छा जाने का संकल्प पाले हैं। ..लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं…।