जिसने माने ये 5 नियम उसके सर होगा विधायक का तमगा !

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विकास वाजपेयी
उत्तर प्रदेश के उपचुनाव की सूची में आने वाली 11 विधानसभाओं के प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला ईवीएम में कैद होने में अब केवल 24 घंटे से भी कम का समय रह गया है। वैसे तो 20 अक्टूबर की शाम से इन सभी 11 विधानसभाओं में चुनाव प्रचार थम गया है लेकिन जानकारों और राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो यदि किसी प्रत्याशी ने इन 5 नियमों का पालन कर लिया तो उसका माननीय विधायक बनने का सपना पूरा हो सकता है।
विश्लेषकों के मुताबिक आज के समय मे प्रत्याशियों की शालीनता के विषय मे सबकी निगाहें टिकी होती है और यदि किसी प्रत्याशी की शालीनता से जुड़ी बात सामने आई तो लोगों में उसके प्रति आकर्षण पैदा होता है और ये भारत के लोगों की सोच में पैठ कर चुका है कि संत प्रकृति का व्यक्ति अपने स्वभाव से वोटर के काफी करीब माना जाता है साथ ही लोगो को बाद में उससे किसी काम को यदि कराने और कहने में यदि डर और संकोच न हो तो लोग उसी को ही अपना बहुमूल्य मत देते है।
इस मामले में दूसरा नियम बहुत ही महत्वपूर्ण समझा जाता है जिसमे शालीनता और दमदार प्रभाव के विषय मे बहुत ही मामूली अंतर होता है और यदि इस अंतर में भिन्नता हुई तो लोगो को प्रत्याशी पर भरोषा नहीं रहता इसलिए धमक के साथ शालीनता का विशेष महत्व है। जिसमे क्षेत्र के लोगों को ये विश्वास होना चाहिए कि जनता के काम को उसका प्रतिनिधि बहुत ही दमदार तरीके से कर सकता है और अधिकारियों में प्रतिनिधि का खौफ बरकरार रखने का भरोसा मिलता है। यानि जनशक्ति के प्रदर्शन से वोटरों का एक बहुत बड़ा तबका प्रत्याशी के साथ खड़ा होता है और इस दूसरे नियम को नजरअंदाज करना हमेशा भारी पड़ता है।
तीसरे नियम के तहत आज के दौर में जनता से जुड़ाव का सशक्त माध्यम सोशल मीडिया के पास है। लोग इस सर्वव्यापी मीडिया तंत्र के माध्यम से अपने जनप्रतिनिधियों के विषय मे चुनाव के दिन तक नजर गड़ाए रखते है और सोशल मीडिया आज के समय मे प्रत्याशियों की इमेज निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। वैसे तो देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया सेल बना कर अपने एजेंडे को जनजन तक पहुचने का काम करता है लेकिन इस पर प्रत्याशी को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए कि उसकी हर एक गतिविधियों की सूचना को बेहतर तरीके से वोटरों को परोसा जाए।
अब आता है चौथा महत्वपूर्ण नियम जिसके बारे में जानते तो हर एक प्रत्याशी है लेकिन उस पर अमल बिरले ही प्रत्याशी कर पाते है। आज के समय मे भी वोटरों का एक ऐसा तबका है जो सोशल मीडिया और भिन्न जानकारियों से खुद को नहीं जोड़ता और उसको लगता है कि यदि प्रत्याशी को उसका वोट चाहिए तो उससे उसको मिलना जरूर चाहिए चाहे उसके पास समय की कितनी भी कमी हो और वो वोटर किसी विचारधारा के आधार पर वोटिंग नही करते बल्कि प्रत्याशियों के जुड़ाव के आधार पर ईवीएम का बटन दबातेँ है। इसमें खासकर निम्न तबके के वोटर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इसलिए निम्न तबके और आयवर्ग के वोटरों से नाराजगी मोल न लेते हुए उनकी उदासी को ध्यान में रखने की सबसे ज्यादा जरूरत है।
अब आता है सबसे अधिक महत्व रखने वाला नियम जिसको आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी लगातार जीत पर जीत दर्ज कर रही है यदि एक दो अपवाद को छोड़ दिया जाए, और वो है बूथ लेवल मैनेजमेंट, जिसको मेनेजमेंट की भाषा मे माइक्रो लेवल मेनेजमेंट भी कह सकते है। प्रत्याशी को इस विषय मे विशेष ध्यान देने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है और मतदान के दिन एक बड़ी संख्या में वोटर इस मैनेजमेंट से प्रभावित होता है जिसको एक नियम के रूप में केंद्र में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने आरएसएस और अपने अनुसांगिक संगठनों ने स्थापित किया है और इसको देखते हुए देश के लगभग सभी प्रमुख दल जोरशोर से अमल में लाने की कवायद कर रहे है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिना बूथ लेवल मैनेजमेंट के चुनाव में जीती की इबारत लिखना बहुत ही दुरूह कार्य बनता जा रहा है और इसके तहत बीजेपी ” हमारा बूथ सबसे मजबूत” कार्यक्रम चलाती रही है।