आर्थिक सुस्ती के बीच महंगाई की मार, वाह सरकार

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ताजा आंकड़ों ने मुसीबत बढ़ाई, प्याज ने आंसू निकाले

सब्जी और दालें महंगी, नमक तक के दाम भी बढ़ रहे

शैलेश अवस्थी

बेहद तेजी से गिरती “आर्थिक विकास दर” पर सरकार अंदरखाने में भले ही चिंता कर रही हो पर प्रकट में तो वह आत्मविश्वास ही झलकाती है। राजनेताओं के तन पर लकालक महंगे वस्त्र, चमचमाती लग्जरी कारें, ठसक और ठाठ देखकर कौन कहेगा कि इन्हें तेजी से नीचे जाती आर्थिक विकास दर की चिंता है या वे आम आदमी की मंहगाई पीड़ा से दुखी हैं। न जाने कितनी नौकरियां चलीं गईं, न जाने कितने कारखानों की चिमनियां ठंडी हैं और न जाने कितनी नौकरियों पर तलवार लटकी है। और इसके बीच महंगाई की गति इतनी तीव्र है कि आम आदमी के लिए प्याज चटनी-रोटी भी मुश्किल है।

जारी किए गए ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले छह महीने से आर्थिक विकास दर लगातार गिर रही है और अब इस तिमाही पर 4.5 फीसदी पर आ गई है। छह महीने पहले 7.1 फीसदी थी, यानी बड़ी गिरावट। कृषि क्षेत्र (4.9 से घटकर 2.1 फीसदी) के हालात तो बेहद खराब है। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर तो बुरी तरह कराह रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने इसे विनाशकारी बताया है, तो दूसरी तरफ आर्थिक सलाहकार सुब्रमणियम कहते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं, अगली तिमाही में हालात सुधरेंगे। साथ ही दावा है कि अर्थ व्यवस्था की बुनियाद बेहद मजबूत है।

सरकार चाहे जितनी दिलासा दे और हौसला बढ़ाए, लेकिन कृषि और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र ही नहीं, रियल स्टेट, खनन, पावर सेक्टर और अन्य क्षेत्रों के हालात भी संतोषजनक नहीं कहे जा सकते। नौकरियों पर खतरा है। न जाने कितनी नौकरियां चलीं गईं और अभी भी न जाने कितने नौकरीपेशा लोगों पर तलवार लटक रही है। छटनी का दौर नहीं रुक रहा। माना कि अंतर्राष्ट्रीय हालात का भी असर है, लेकिन सवाल यह भी है कि सरकार ने जो कदम उठाए हैं, वे क्या पर्याप्त हैं या फिर कहीं न कहीं कोई चूक है ? राजकोषीय घाटा भी निरंतर बढ़ रहा है, लेकिन अपनी सरकार के ठाठ में कोई कमी दिख नहीं रही है। बाजार में पैसा नहीं आ रहा। जाहिर है कि लोगों की जेब में पैसा नहीं है या फिर वे भविष्य की चिंता में उसे संजोय हैं। बाजार में मांग नहीं होगी तो उत्पाद बिकेंगे नहीं और जब यह हालात होंगे तो पैसा का आवागमन रूक जाएगा। कारखानों के चक्के थम जाएंगे और कोई कब तक जेब से वेतन देगा। तब यह आर्थिक सुस्ती सबसे बुरी मंदी की ओर बढ़ जाएगी। लोन सस्ता हुआ है पर जरा सोचिये कि क्या इससे पेट भरेगा। घर से पहले पेट की चिंता होती है। आदमी को तो दो वक्त की रोटी ही चाहिये। यह भी खुलासा होना चाहिये कि सरकार ने अपने खर्च में कितनी कटौती की है ? क्या वह सिर्फ जरूरी खर्च ही कर रही है ? कारपोरेट टैक्स में कटौती और सरकारी बैंकों को “बूस्टर डोज” का क्या असर रहा ? विदेशी निवेश कितना आया ?

दूसरी तरफ, महंगाई की तरफ भी सरकार का कोई खास ध्यान नहीं है। पिछले तीन महीने से प्याज की कीमतें आसमान छूती जा रही हैं। एक लाख टन प्याज आयात की बात थी पर अभी तक 15 हजार टन का ही आर्डर दिया जा सका है। अब तो प्याज 80 से 100 रुपये किलो तक बिक रहा है। मौका देख मुनाफाखोर और जमाखोर सक्रिय हो गए। इन पर कोई एक्शन नहीं हो रहा है। लगता है कि विपक्ष बस “लाइम लाइट” पर आने के लिए ही शोर मचा रहा है। बेहतर हो कि विपक्ष समझदारी से सरकार के साथ बैठे और रास्ता निकाले। अमूमन आम आदमी की जीडीपी ग्रोथ और अर्थशास्त्र की तकनीक नहीं समझता। वह आंकड़े नहीं, बाजार में जरूरी वस्तुओं के दाम देखता है और इससे उसे पता चलता है कि सरकार को उसकी कितनी चिंता है।

हाय महंगाई

प्याज ही नहीं, हर उपभोक्ता वस्तु पर महंगाई की मार है। देखा जाता है कि सर्दियों में सब्जी सस्ती हो जाती है, लेकिन हालत यह है कि प्याज 80-90, टमाटर 50-60, मटर 50-60, आलू 20-25 किलो बिक रहा है। गेहूं 18-22 तो आटा 25-30 रुपये किलो की दर से बिक रहा है। दाल-चावल के तेवर भी कम नहीं हैं। अरहर फूल 90-100, मूंग 92-98, उड़द 140-150 तो चना दाल 60-70 रुपये बिक रही है। चावल 25 से 150 रुपये किलो है। 5 से 10 फीसदी तक दाम बढ़े हैं। सेंधा नमक तो आम आदमी के वश की बात नहीं है। दूध, दही, पनीर के दाम भी 20 फीसदी तक बढ़ गए हैं। शास्त्री नगर में सब्जी विक्रेता रवि बताते हैं कि पिछले साल के मुकाबले सब्जी 20 फीसदी तक महंगी है, लेकिन प्याज ने तो महंगाई के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। अब तो भाव किलो नहीं, पाव के हिसाब से बताते हैं, ताकि ग्राहक को धक्का न लगे।

तो क्या फल से पेट भरें

मजे की बात है कि रोटी, दाल और सब्जी से सस्ते तो फल बिक रहे हैं। सेब 60-70, अनार 60-70, संतरा 50-60, मौसमी 55-60, पपीता 40-45 किलो तो केला 40-50 रुपये दर्जन बिक रहा है। जाहिर है कि फल तो सब्जी से सस्ते हैं। सूखे मेवे के दाम भी 15 से 20 फीसदी तक बढ़े हैं।

किचन का पर्चा

शारदा नगर निवासी गृहणी नीरजा बताती हैं छह महीने पहले किचन खर्च में 20 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। आटा, दाल, चावल, घी, रिफाइंड, तेल, मसाले और यहां तक कि नमक भी महंगा हो गया है। प्याज तो अब मेहमानों के लिए ही रखते हैं, अपने नसीब में तो फिलहाल नहीं। अब तो मोबाइल फोन रखना भी महंगा हो गया। पिछले महीने से तो रिचार्ज करवाना भी महंगा हो गया।